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Tuesday, 16 February 2016
उड़ान- 2015-16
उड़ान- 2015-16,
नदी-नालों का है
इतना हमसे कहना
कूड़ा-कचरा
मुझमें मत भरना
-जितेन्द्र पाल
कक्षा 8 अ
उड़ान- 2015-16
स्कूल के कमरे
करते रहते हैं रोज
बच्चों का इंतजार
-रोहित सिंह बघेल
कक्षा 8 अ
उड़ान- 2015-16
पतंगे उड़े
बहुत डरे-डरे
शायद कोई पीछे है
-बैजनाथ
कक्षा 8 अ
उड़ान- 2015-16
बादलों के बीच
आराम कर रहा है सूरज
सर्दी का दिन
-अखिलेश शर्मा
कक्षा 8 अ
उड़ान- 2015-16
चिडिया की नन्हीं बच्ची
कर रही है चीं चीं चीं
भूख के मारे
-सत्यम
कक्षा 8 अ
उड़ान 2015-16
अन्न का दाना गिरा
कहीं से एक चींटी आयी
तुरन्त ले गयी
-सत्यम
कक्षा 8 अ
Monday, 16 February 2015
Friday, 13 February 2015
उड़ान-2014-15
बत्तख की चिन्ता
एक बत्तख नदी में तैर रही थी। वह बहुत चिन्तित थी। तैरते हुए बत्तख आकाश में उड़ते पक्षियों को देख रही थी। वह बार-बार यही सोच रही थी कि वह आकाश में अन्य पक्षियों की तरह आखिर क्यों नहीं उड़ सकती। बत्तख को उदास देखकर एक आदमी आया और उससे बोला कि ‘तुम क्यों उदास हो?’ बत्तख ने कहा कि- वह इसलिए चिन्तित है कि वह आकाश में अन्य पक्षियों की तरह क्यों नहीं उड़ सकती है? आदमी ने बत्तख से कहा कि सबको प्रकृति ने कुछ न कुछ विशेषता दी है। किसी को उड़ने की, किसी को पेड़ों पर चढ़ने की, किसी को दो पैरों पर चलने की तो किसी को कुछ और....। तुम्हारे पास पानी में तैरने की अद्भुत शक्ति है, इसी में तुम्हें खुश रहना चाहिए। बत्तख नहीं मानी, वह तो उड़ने के लिए जिद कर रही थी। आदमी ने बत्तख से कहा कि वह पेड़ पर चढ़कर दिखाये, बत्तख पेड़ पर चढ़ने लगी परन्तु गिर गई, वह फिर चढ़ी और फिर गिर गई। वह कई बार चढ़ी और गिर गई उसके चोट भी लग गई तब उसकी समझ में आ गया कि आदमी ठीक कह रहा है। जिसके पास जो गुण है उसी में खुश रहना चाहिए। बत्तख की समझ में यह बात आ गई और उसकी चिन्ता दूर हो गई।
-शिवम पाण्डेय
कक्षा 9 अ
Sunday, 22 December 2013
उड़ान-2013-14
गिलहरी बहुत छोटी होती है। वह हमारे आस-पास ही रहती है। पेड़ों पर गिलहरी बहुत तेजी से चढ़ जाती है। गिलहरी बहुत चालाक होती है और नटखट भी। जब घर की छत पर मम्मी दाल, चावल सुखाने के लिए डालती है तो गिलहरी चुपके से उठा ले जाती है।
== हाइकु ==
उठा ले जाती
छत से गिलहरी
दाल चावल
-सुजाल विश्वास
कक्षा 6 अ
The squirrel
takes away from the roof
lentils and rice
-Sujal Vishwas
Class- VI-A
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बच्चों के हाइकु- Children’s haiku,
हाइकु
उड़ान-2013-14
नीम का पेड़ बहुत उपयोगी होता है। नीम की पत्तियाँ हवा में गिर जाती हैं जिनसे खाद बनती है। नीम के फल जिन्हें निबौरी कहते हैं बरसात के दिनों में नीम के पेड़ के नीचे गिर जाती हैं जब बरसात के दिनों में छोटे-छोटे पौधे बनकर उग आते है, ऐसा लगता है मानो नीम के बच्चे नीम के पेड़ के नीचे खड़े हों।
== हाइकु ==
तने खड़े हैं
नीम के नन्हें बच्चे
नीम के नीचे
-राजू कुमार पाण्डेय
कक्षा- 7 ई
Standing tall
the neem’s little children
beneath the neem
-Raju Kumar Pandey
Class- 7 E
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बच्चों के हाइकु- Children’s haiku,
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Sunday, 3 February 2013
जरूरी बातें
- कन्हैया
- एक साल में 5,25,500 मिनट होते हैं।
- 70 साल की उम्र में हमारा दिल 2 अरब 250 करोड़ बार धड़कता हैं।
- दुनिया का सबसे छोटा साँप 11.8 सेमी. लम्बा है, जिसका नाम थ्रेड स्नेक है।
- नीले खून वाली मछली कटल फिश हैं, और इसमें तीन दिल पाये जाते हैं।
- ‘आहा वो डान्फल दुनिया का ऐसा शख्स था जो अपनी दाढ़ी में मधुमक्खी पालता था।
- दुनिया की सबसे बड़ी छिपकली इन्डोनेशिया में हैं, जिसकी लम्बाई 6 मीटर, वजन 100 किलो हैं।
- कन्हैया
कक्षा - १० स
दिल्ली की प्रदूषण रहित यात्रा-(मैट्रो रेल)
- शुभम कुमार झा
मैट्रो रेल की शुरुआत 24 दिसंबर 2002 को दिल्ली में हुई थी । मैट्रो स्टेशन की सीढ़ियाँ लिफ्ट वाली है। मैट्रो स्टेशन में प्रवेश करने व बाहर आने के लिए स्मार्ट कार्ड व टोकन से नियंत्रित ऑटोमैटिक दरवाजे लगे हुए है। मैट्रो में सुरक्षा के लिए ड्रेस गार्ड एवं सी.सी.टी.वी. कैमरे का प्रबंध किया गया है। टिकट की व्यवस्था के लिए स्मार्ट कार्ड का प्रबंध किया गया है। ये एक वर्ष तक चलाये जा सकते हैं। जो व्यक्ति कभी-कभी मैट्रो से यात्रा करते है उनके लिए सिंगल टोकन भी उपलब्ध है। एक तरफ की यात्रा के लिए (लाल टोकन) का उपयोग किया जाता है। मैट्रो एक दिशा में प्रति घंटे में 60,000 यात्रियों की वहन क्षमता है। इसमें ऑटोमैटिक डोर सिस्टम लगाया गया है। मैट्रो रेल के दरवाजे सिर्फ 30 सेकेण्ड के लिए खुलता है। अपंग व विक्लांग लोगों के लिए मैट्रो स्टेशन में प्रवेश के लिए एक अलग लिफ्ट बनाया गया है। मैट्रो हमें सड़क यातायात और भीड़-भाड़ से बचाकर आराम से मंजिल तक पहुँचाता है। यह बिजली से चलने के कारण प्रदूषण रहित है। यह मैट्रो अत्यंत आरामदायक सुविधाओं से भरपूर है।
-शुभम कुमार झा
कक्षा- 10 डी
गुरु का महत्व
-गुरु का महत्व
सबसे बढ़कर इस दुनिया में,
सिर्फ गुरु का है नाम
माता जन्म हमें देती है,
शिक्षा देना गुरु का है काम
गुरु अगर साथ न हो तो,
आगे हम कैसे बढ़ पायेंगे
शिक्षा जब साथ न हो तो,
पषु मात्र कहलाएँगे
सम्मान करें हम सब गुरु का
सम्मान तभी हम पायेंगे
अगर बात न मानेंगे गुरु की,
फिर जीवन भर पछताएँगे
नाम - अमन बिष्ट
कक्षा - 7 अ
Saturday, 2 February 2013
असफलता डर कर भागोगी
प्यारे बच्चो चलते जाओ
जीवन पथ पर शान से
कभी हारकर मत रुक जाना
आँध्ाी या तूफान से
मंजिल तुमको तभी मिलेगी
आलस को जब त्यागोगे
अलसायी आँखें खोलोगे
सदा समय पर जागोगे
असफलता डर कर भागेगी
और सफलता पाओगे
बड़े आदमी बन जाओगे
जग में नाम कमाओगे।
-मो0 जुनैद आलम कादरी
कक्षा 7 ए
पेड़ लगायें, पेड़ बचायें
ऊँट
ऊँट चला भई ऊँट चला
हिलता डुलता ऊँट चला
ऊँचा ऊँचा ऊँट चला
ऊँट चला भई ऊँट चला
ऊँची गर्दन ऊँची पीठ
पीठ उठाये ऊँट चला
बालू में भी खूब दौड़ता
बोझ उठाये ऊँट चला
ऊँचा कूबड़ लिये पीठ पर
कूबड़ वाला ऊँट चला
थक जायेगा तब बैठेगा
जाने किस करवट बैठेगा
बल बल करता ऊँट चला
ऊँट चला भई ऊँट चला
-मनीष सिंह
कक्षा 7 ब
Wednesday, 16 November 2011
मन का भय
आकाश हल्दर
कक्षा-11 अ
राजकीय उच्चतम बाल विद्यालय
न्यू अशोक नगर दिल्ली
मेरा भय मेरी जिन्दगी का सबसे बुरा अनुभव रहा है। मैंने अपनी प्राथमिक शिक्षा एक प्राइवेट स्कूल से शुरू की थी। मैं हमेशा से ही पढ़ाई में अच्छा रहा हूँ। जब मैं प्राइवेट स्कूल पाँचवीं कक्षा में पढ़ता था तब परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण मेरे पिता जी ने सरकारी विद्यालय में मेरा दाखिला कराया। मैं सन २००६ में अपने विद्यालय में आया। शुरू शुरू में मुझे थोड़ी कठिनाई आई फिर बाद में सब कुछ ठीक हो गया। अब मैं कक्षा ग्यारह में पढ़ता हूँ। इससे पहले मैं किसी भी कार्यक्रम या प्रतियोगिता में भाग लेने में डरता था जिसके कारण मैंने आज तक किसी भी प्रतियोगिता में भाग नहीं लिया। मेरे दोस्तों ने अनेक प्रतियोगिताओं में भाग लिया और उन्होंने कई मेडल और पुरस्कार भी जीते। मैं अपने भय की बजह से कोई भी पुरस्कार कभी भी नहीं जीत सका। लेकिन कक्षा ग्यारह में आने के बाद मुझे नए अध्यापक, नई किताबें और नए विषय मिले। सभी अध्यापकों और प्रधानाचार्य जी ने सभी विद्यार्थियों को विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया। अध्यापकों और प्रधानाचार्य जी से प्रेरणा पाकर मुझमें कार्यक्रमों और प्रतियोगिताओं में भाग लेने की इच्छा जागी। मैं इस पत्रिका के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि सभी विद्यार्थियों को विद्यालय में होने वाली प्रतियोगिताओं में अधिक से अधिक भाग लेना चाहिए।
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